शौर्य स्मृतियां : अमर शहीद सिपाही रणबीर सिंह

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(सुधीर सलूजा)

भारत की मिट्टी ने ऐसे असंख्य वीर सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनके लिए मातृभूमि केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि मां के समान पवित्र थी। ऐसे ही अमर शहीदों में गांव सिवाह, जिला पानीपत के वीर सपूत सिपाही रणबीर सिंह का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।रणबीर सिंह का जन्म पानीपत जिले के गांव सिवाह में हुआ। उन्होंने दसवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वर्ष 1962 में भारतीय सेना में भर्ती होकर देशसेवा का संकल्प लिया। उन्हें 7 जाट रेजीमेंट (सेवा क्रमांक -3146 295) में सेवा करने का अवसर मिला। सेना की वर्दी पहनते ही उनके जीवन का उद्देश्य स्पष्ट हो गया था—देश की रक्षा और आवश्यकता पड़ने पर मातृभूमि के लिए अपना जीवन अर्पित करना।वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान रणबीर सिंह ने अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। मात्र 23 वर्ष की आयु में 9 सितंबर 1965 को दुश्मन का सामना करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनका जीवन भले ही छोटा रहा, लेकिन उनकी शहादत ने उन्हें अमर कर दिया। राष्ट्र ने उनके अदम्य साहस और वीरता को नमन करते हुए उन्हें सम्मानित किया।रणबीर सिंह की शहादत की कहानी केवल रणभूमि तक सीमित नहीं है। इसके साथ एक ऐसी पारिवारिक पीड़ा और त्याग की कहानी भी जुड़ी है, जिसे सुनकर मन भावुक हो उठता है। उनकी शादी को अभी कुछ ही वर्ष हुए थे। उस समय उनकी पत्नी की आयु लगभग 16 वर्ष थी और वह गर्भवती थीं। परिवार में आने वाली नई जिंदगी की खुशियों की प्रतीक्षा हो रही थी, लेकिन नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। देश की रक्षा करते हुए रणबीर सिंह शहीद हो गए।उनकी शहादत के लगभग पांच महीने बाद, 11 फरवरी 1966 को उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया। यह पुत्र अपने पिता को देख भी नहीं सका, लेकिन उसके जीवन की पहली पहचान ही एक शहीद के पुत्र की थी। परिवार के बुजुर्गों, विशेषकर दादा-दादी ने उसका पालन-पोषण किया और उसे संस्कार, शिक्षा तथा अपने पिता की शहादत का गौरव दिया।इस बालक का नाम रणदीप रखा गया। पिता की छाया के बिना पले रणदीप के जीवन में कठिनाइयां कम नहीं थीं, लेकिन परिवार के संस्कारों और अपने पिता की वीरगाथा ने उन्हें निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने शिक्षा प्राप्त की, ग्रेजुएशन किया और वकालत की पढ़ाई पूरी की। जीवन में आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपने गांव और समाज की सेवा को अपना उद्देश्य बनाया।आज शहीद रणबीर सिंह के पुत्र रणदीप कादियान गांव सिवाह, पानीपत के सरपंच के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उनके नेतृत्व में शैक्षणिक संस्थाओं का संचालन भी हो रहा है। यह यात्रा अपने आप में उस शहीद की विरासत का विस्तार है, जिसने 1965 में देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।एक ओर पिता रणबीर सिंह ने सीमा पर खड़े होकर राष्ट्र की रक्षा की, वहीं दूसरी ओर उनके पुत्र ने शिक्षा और सामाजिक सेवा के माध्यम से अपने गांव और समाज की सेवा का मार्ग चुना। यह एक ऐसी विरासत है जिसमें बलिदान, शिक्षा, सेवा और संस्कार—चारों एक साथ दिखाई देते हैं।सिपाही रणबीर सिंह कादियान की कहानी हमें यह भी बताती है कि किसी सैनिक की शहादत केवल उस क्षण तक सीमित नहीं रहती जब वह रणभूमि में अपने प्राण देता है। उसकी शहादत आने वाली पीढ़ियों के जीवन को भी प्रभावित करती है। एक सैनिक अपने वर्तमान को राष्ट्र के भविष्य के लिए समर्पित करता है और उसकी संतान उस बलिदान की विरासत को आगे बढ़ाती है।आज जब गांव सिवाह में शहीद रणबीर सिंह का नाम लिया जाता है, तो यह केवल एक वीर सैनिक की स्मृति नहीं है, बल्कि उस परिवार की तपस्या का भी स्मरण है जिसने अपने युवा बेटे, पति और पिता को राष्ट्र के लिए खोया। उनकी वीर पत्नी ने अल्पायु में ही वैधव्य का दुख सहा, दादा-दादी ने अपने पोते को संभाला और उस शहीद के पुत्र ने संघर्षों के बीच शिक्षा प्राप्त कर समाज में अपनी पहचान बनाई।सिपाही रणबीर सिंह कादियान की शहादत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्रसेवा के लिए उम्र नहीं, बल्कि साहस और समर्पण चाहिए। और उनकी जीवन-यात्रा का दूसरा अध्याय यह संदेश देता है कि शहीद की विरासत केवल स्मारकों में नहीं, बल्कि उसके परिवार और समाज के कर्मों में जीवित रहती है।रणबीर सिंह कादियान ने 23 वर्ष की अल्पायु में मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनके जीवन के वर्ष कम थे, लेकिन उनकी कीर्ति अमर है। उनका बलिदान भारत की वीरगाथा का हिस्सा है और गांव सिवाह की धरती के लिए सदैव गर्व का विषय रहेगा।अमर शहीद सिपाही रणबीर सिंह को शत-शत नमन।

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