नई दिल्ली, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण क्षेत्र में असामान्य परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं, जिसके चलते बड़ी संख्या में लोग यूनाइटेड अरब अमीरात में फँस गए थे। चाँदनी चौक दिल्ली से सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने बताया कि मेरी बेटी सौम्या खंडेलवाल जो व्यापारिक कार्य से गई थी वो भी पिछले तीन दिनों से दुबई में फँसी हुई थी, लेकिन आज सुबह सुरक्षित भारत लौट आई है। एक पिता के रूप में पिछले कुछ दिन अत्यंत चिंता और बेचैनी में गुज़रे, किंतु उसकी सुरक्षित वापसी मेरे लिए अत्यंत भावुक और राहत भरा क्षण है।
बेटी से हुई बातचीत से इन परिस्थितियों में एक अत्यंत प्रेरणादायक और सराहनीय बात सामने आई। इतनी अधिक मांग होने के बावजूद न तो होटलों ने किसी प्रकार की ओवरचार्जिंग की और न ही एयरलाइंस ने किरायों में अनावश्यक वृद्धि की। स्थानीय टैक्सी सेवाओं और अन्य सेवाओं ने भी अपनी सामान्य दरें बनाए रखीं और किसी को भी परेशान नहीं होने दिया। संकट की इस घड़ी में व्यवस्था, अनुशासन और संवेदनशीलता के साथ लोगों की सहायता करना वास्तव में अत्यंत प्रशंसनीय है।
विशेष रूप से उल्लेखनीय यह भी है कि वहाँ न केवल भारतीय समुदाय बल्कि दुबई के स्थानीय नागरिक भी लोगों की सहायता के लिए पूरी तत्परता से आगे आ रहे थे। युद्ध की परिस्थितियों के बावजूद, सुरक्षा संबंधी आवश्यक सावधानियों को छोड़ दें तो जीवन सामान्य रूप से चलता हुआ दिखाई दिया, जो वहाँ की प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक संवेदनशीलता का परिचायक है।
भारतीय दूतावास और भारतीय मिशन भी लगातार ऐसे सभी लोगों के संपर्क में रहे और यथासंभव सहायता प्रदान करते रहे। जानकारी के अनुसार कल केवल दो–तीन घंटे के लिए वायु मार्ग खुला और इसी दौरान लगभग नौ उड़ानें भारत के विभिन्न शहरों के लिए रवाना हुईं, जिससे अनेक भारतीय सुरक्षित अपने घर लौट सके।
इन सबके पीछे एक और महत्वपूर्ण पहलू है—भारत और यूएई के बीच अत्यंत मजबूत और विश्वासपूर्ण संबंध। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और दुबई के नेतृत्व, विशेषकर श्री मोहम्मद रशीद अल मकतूम के बीच मधुर और घनिष्ठ मित्रतापूर्ण संबंधों ने दोनों देशों के बीच सहयोग और समन्वय को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है। यही विश्वास और आपसी सम्मान संकट के समय वास्तविक रूप से काम आता है और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
यूएई ने यह साबित किया है कि एक जिम्मेदार राष्ट्र अपने नागरिकों और वहाँ मौजूद लोगों के साथ किस प्रकार संवेदनशीलता और अनुशासन के साथ व्यवहार करता है। हमें भी इससे यह महत्वपूर्ण सीख लेनी चाहिए कि संकट के समय किसी भी स्थिति का अनुचित लाभ उठाना समाज और राष्ट्र दोनों के लिए घातक होता है।
संकट की घड़ी में यदि नागरिक संयम, ईमानदारी और संवेदनशीलता का परिचय दें, तो वही किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति बनती है। राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों के प्रयासों से नहीं होता, बल्कि नागरिकों के जिम्मेदार आचरण से होता है। यदि हर नागरिक यह संकल्प ले कि वह किसी भी परिस्थिति में अवसरवादिता से दूर रहेगा और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएगा, तो हमारा देश और अधिक मजबूत, संवेदनशील और गौरवशाली बनेगा।
सहानुभूति, अनुशासन और जिम्मेदारी की यही भावना किसी भी राष्ट्र की असली पहचान होती है और यही भावना हमें एक सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ाती है।
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